सैलाना श्री जैन मूर्ति पूजक श्रीसंघ द्वारा उज्जैन प्रवास के दौरान डॉ.अनिल जैन ‘खवासा वाले’ का किया बहुमान
सेवा, समर्पण और विनम्रता की मिसाल बने डॉ. अनिल जैन ‘खवासा वाले’
ब्यूरो चीफ- कृष्णकांत मालवीय, एमपी की खबर रतलाम
रतलाम- (एमपी की खबर) श्री जैन मूर्ति पूजक श्रीसंघ, सैलाना द्वारा उज्जैन प्रवास के दौरान चिकित्सक डॉ. अनिल जैन ‘खवासा वाले’ का बहुमान किया गया। श्रीसंघ के सदस्यों ने उज्जैन पहुंचकर डॉ. जैन का सम्मान किया। इस अवसर पर संघ के अध्यक्ष सुरेंद्र मेहता, राजेंद्र चंडालिया, अभय रांका, अनिल चंडालिया, ललित चंडालिया, मनोज भंडारी उपस्थित थे।
डॉ. अनिल जैन का श्रीसंघ से विशेष जुड़ाव उस समय और अधिक आत्मीय हो गया, जब उन्होंने पूज्य महाराज साहेब के उपचार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महाराज साहेब के उपचार के दौरान डॉ. जैन ने न केवल चिकित्सकीय दायित्व का निर्वहन किया, बल्कि एक सेवाभावी जैन श्रावक के रूप में भी अपनी संवेदनशीलता और समर्पण का परिचय दिया। हालांकि उपचार के उपरांत 100 दिन पूर्ण होने पर महाराज साहेब का कालधर्म हो गया, लेकिन उपचार के दौरान डॉ. अनिल जैन द्वारा की गई मदद और सेवा को श्रीसंघ आज भी कृतज्ञता के साथ स्मरण करता है। उपचार के दौरान अस्पताल में आए खर्च के संबंध में भी डॉ. जैन ने असाधारण उदारता और सरलता का परिचय दिया। उन्होंने अस्पताल के बिल में बिना किसी लाग-लपेट के ‘नील’ अर्थात कोई राशि बकाया नहीं लिखवाकर उसे भैया अंकित के सुपुर्द कर दिया।विशेष बात यह रही कि जीतो संस्था की ओर से कार्ड होने के बावजूद उपचार की राशि अब तक प्राप्त नहीं हुई थी। ऐसी परिस्थिति में भी डॉ. जैन ने आर्थिक विषय को लेकर किसी प्रकार की अपेक्षा अथवा आग्रह नहीं रखा। उनके लिए महाराज साहेब की सेवा और उपचार ही सर्वोपरि रहा।
अचानक पहुंचे श्रीसंघ के सदस्य तो बोले-‘मिच्छामि दुक्कड़म’
श्रीसंघ के सदस्य जब अचानक उज्जैन में डॉ. अनिल जैन के पास पहुंचे तो उन्हें इसकी पूर्व जानकारी नहीं थी। श्रीसंघ के सदस्यों के अचानक पहुंचने पर डॉ. जैन ने प्रारंभ में बहुमान स्वीकार करने में संकोच किया, लेकिन जब सदस्यों ने उनके सेवाभाव के लिए कृतज्ञता व्यक्त की तो डॉ. जैन की विनम्रता ने सभी का मन जीत लिया। डॉ. साहब ने सबसे पहले श्रीसंघ के सदस्यों से ‘मिच्छामि दुक्कड़म’ कहा। उनकी यह सहजता और विनम्रता उपस्थित सभी सदस्यों को भावविभोर कर गई। इतने बड़े चिकित्सक होने के बावजूद उन्होंने अपने कार्य का कोई बखान नहीं किया और न ही यह कहा कि उन्होंने अपनी ओर से पूरा प्रयास किया था। इसके विपरीत उन्होंने अत्यंत सहज भाव से सेवा को अपना कर्तव्य माना। इतना ही नहीं, डॉ. जैन ने अपनी ओर से भी कुछ राशि देने की भावना व्यक्त की और कहा कि यदि कहीं से राशि नहीं आती है तो वे स्वयं अपने नाम से राशि देकर उसे महाराज साहेब की सेवा में सुपुर्द करेंगे। उनका यह भाव उपस्थित श्रीसंघ के सदस्यों के लिए अत्यंत प्रेरणादायी रहा।
‘जैनसेवक’ का बहुमान कर स्वयं गौरवान्वित हुआ श्रीसंघ-
श्री जैन मूर्ति पूजक श्रीसंघ के सदस्यों ने कहा कि डॉ. अनिल जैन ने अपने व्यवहार और सेवा से यह सिद्ध किया है कि चिकित्सा केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि मानव सेवा का माध्यम भी है। उन्होंने उपचार के साथ-साथ जिस प्रकार आर्थिक सहयोग, संवेदनशीलता, विनम्रता और धार्मिक भावनाओं का परिचय दिया, वह अनुकरणीय है। श्रीसंघ के सदस्यों ने कहा कि डॉ. जैन जैसे सेवाभावी व्यक्तित्व का बहुमान करना वास्तव में श्रीसंघ के लिए ही गौरव की बात है। उनका सम्मान केवल एक चिकित्सक का सम्मान नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण, करुणा और विनम्रता जैसे जैन मूल्यों का सम्मान है। इस अवसर पर उपस्थित सदस्यों ने डॉ. अनिल जैन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य और निरंतर सेवाकार्यों के लिए मंगलकामनाएं प्रेषित कीं।




