सकरावदा-शिवगढ़ घाट के जंगलों में छाई पलाश के फुलो की बहार

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सकरावदा-शिवगढ़ घाट के जंगलों में छाई पलाश के फुलो की बहार

4/Mar/2025

ब्यूरो रिपोर्ट mpkikhabar रतलाम 

स्पेशल खबर- कृष्णकांत मालवीय 

रतलाम (Ratlam,mp)- होली पर्व जैसे-जैसे नजदीक आता चला जा रहा है। वैसे-वैसे सैलाना क्षैत्र के आदिवासी अंचलो के जंगलों में लाल केसरिया रंग के पलाश (टेशु) के फूलों की बहार छाना शुरू हो गई है।पलाश के फूल पेड़ों की डालियों पर लाल और पीले रंगो में खुबसूरत दिखाई दे रहा है। यह फूल लोगों को अपनी ओर काफी आकर्षित करता नजर आ रहा है। जगह-जगह पेड़ों की डालियों पर खिलता नजर आने वाले यह फूल आखों को अलग ही सुकून दे रही है।

मंगलवार को सैलाना नगर से लगभग 10 किलोमीटर दूर सकरावदा-शिवगढ़ मार्ग स्थित जुनापानी घाट पर पलाश (टेशु) के फुलों की बहार छाना शुरू हो गई है। पलाश के फुल इस घाट पर आने जाने वाले लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। आदिवासी अंचल में पलाश के फुलों के पेड़ बड़ी संख्या में मौजूद हैं। बताया जाता है कि पुरानी परम्परा व प्राचीन काल के अनुसार होली पर्व पर होली खेलते समय लोग इन फूलों का उपयोग करते थे। होली में इस फूल का महत्व काफी बढ़ जाता है। विशुद्ध रूप से प्रकृति निर्मित इस रंग से होली का त्योहार और भी रंगीन नजर आता है। भले ही अब इन फुलो का उपयोग कम नजर आता है। लेकिन इनके गुणों की वजह से आज भी इनके रंगों का महत्व कायम है। पलाश के फूल से बने प्राकृतिक रंग से लोग होली खेलते थे। पहले लोग होली पर रासायनिक रंगो से दूर रहकर प्राकृतिक रंगों का भरपूर इस्तेमाल होली खेलने में करते थे। लोग होली के पूर्व टेसू (पलाश) के फूल से प्राकृतिक रंग तैयार करते थे ओर होली खेलते थे। बताया जाता है कि उस से चेहरे की स्किन व अन्य त्वचा पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता था। अब बाजार में रासायनिक रंग आने के कारण लोग टेसू के फूल को भूल ही गए ओर रंग-बिरंगे रंगो से होली खेलने लगे है।जैसे ही मार्च का महीना आता है और पूरे क्षेत्र में टेसू के फूल की बाहर आ जाती हैं।

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