सैलाना आदिवासी अंचलों के अधिकतम विद्यालय भवन हुए जर्जर
कभी भी हो सकता बड़ा हादसा। जिम्मेदारों का इस ओर नहीं कोई ध्यान।
ब्यूरो रिपोर्ट mpkikhabar रतलाम
रतलाम- (संतोष चौहान/कृष्णकांत मालवीय) झालावाड़ की घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। प्रशासन की गलती की वजह से यदि शिक्षा ग्रहण करने गए बच्चे मौत के मुंह में चल जाए, तो इस व्यवस्था को क्या कहा जाए? ऐसा नहीं है कि यह स्थिति सिर्फ राजस्थान के अंचलों की है। बल्कि मध्य प्रदेश में भी कमोबेश यही स्थिति है। सैलाना ब्लॉक को ही लिया जाए। इस ब्लॉक में आदिवासी अंचल के अधिकतर स्कूल तीन दशक पूर्व बने हुए हैं जो जर्जर अवस्था में है। उनकी छतो से पानी टपकता है, मलबा गिरता है और ऐसी खतरनाक स्थिति में बच्चों को विद्या ग्रहण करना पड़ रही है। फिलहाल की ताजा घटना के पश्चात अब सैलाना ब्लॉक में भी आनन-फानन में ऐसे स्कूल चिन्हित किए जा रहे हैं। प्रारंभिक जानकारी में 16 ऐसे स्कूल प्रकाश में आए हैं। जहां के बच्चों को शनिवार को अध्ययन कराने के बजाय घर भेजा गया। पर यह स्थिति आखिर कब तक?
सिर्फ शहरी क्षेत्र के भवन ही अच्छे-
सूत्र बताते हैं कि केवल शहरी व कस्बाई क्षेत्र के बड़े स्कूलों की स्थिति ही अच्छी है। दूर दराज के शाला भवन कोई ढाई से तीन दशक पुराने हैं। लगभग सभी इसी स्थिति में है। स्थिति यह है कि संबंधित अधिकारी-कर्मचारी इस संबंध में बात करने से भी कतरा रहे हैं।
यह एक बानगी-
सैलाना विकासखंड के सांसर पंचायत के ग्राम पागड़ियामऊडी की स्थिति देखें। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है। पूरी तरह से जर्जर हो चुके इस स्कूल भवन में 65 विद्यार्थी है। शाला प्रभारी बाबूलाल मईड़ा ने बताया कि ऊपर से आदेश है कि यदि शाला भवन जर्जर है तो विद्यार्थियों को आस-पास कही सुरक्षित भवन में बिठाकर पढ़ाया जाए या छुट्टी कर दी जाए। आज अत्यधिक बरसात के कारण छुट्टी कर दी गई। आस-पास कहीं ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जहां बच्चों को बिठाया जा सके।
कई बार अवगत कराया-
ऐसा भी नहीं है कि इस बदहाल स्थिति से अधिकारी वाकिफ नहीं हो। दरअसल सूत्र बताते हैं कि इस स्थिति से कई बार उच्च अधिकारी को लिखित व मौखिक अवगत कराया जा चुका है। फिर भी स्थिति जस की तरह बनी हुई है। कक्षा में पानी टपकता है। मलबा गिरता है। कई बार बच्चों के कपड़े, कापी,किताबें व स्कूल बैग भी गीला हो जाता है। ऐसी स्थिति में बच्चे स्कूल आते जाते रहते हैं। स्कूल भवन की छत का सरिया भी साफ दिखाई दे रहा है। मलबा भी टूट-टूट के गिर रहा है वह भी नजर आता है। यह बानगी तो सिर्फ एक स्कूल की है। दरअसल 16 स्कूल की रिपोर्ट तो आ ही चुकी है कि ये स्कूल भी इस स्थिति में है।
ये है वो 16 स्कूल-
झालावाड़ की घटना के बाद आनन-फानन में प्रशासन ने और जगह की जानकारियां जुटाई तो ये जानकारी प्रकाश में आई प्राथमिक शाला पाटडा, माध्यमिक शाला बल्लीखेड़ा, माध्यमिक शाला आंबापड़ा, माध्यमिक शाला बावड़ी, माध्यमिक शाला कांसाखारी, माध्यमिक शाला सालरापाडा क्रमांक 2, प्राथमिक शाला कुंडा, प्राथमिक शाला कालाभाटा, प्राथमिक शाला टोरी, प्राथमिक शाला पिंडवरा, प्राथमिक शाला झरी, प्राथमिक शाला सेमलखेड़ा, माध्यमिक शाला एकीकृत सेमलखेड़ा, प्राथमिक शाला फुफीरूडी, प्राथमिक शाला गायरीपाड़ा, प्राथमिक शाला आयडुपाड़ा इन स्कूलों के जर्जर होने की जानकारी प्रकाश में आ चुकी है। एवं विभाग के पास भी पहुंच चुकी है। फिलहाल यह कहा जा रहा है कि इन भवनों में स्कूल ना लगाया जाए एवं आस-पास कहीं कोई मंदिर या अन्य भवन हो वहां विद्यार्थियों को शिफ्ट किया जाकर वहां अध्ययन कराया जाए। पर लाख टके का सवाल यह है कि ज्यादातर शालाओं के आस-पास भी कोई ऐसा भवन नहीं है, जो सुरक्षित हो। और वहां शालाएं लगाई जा सके। तो क्या अब जब तक नए भवन बनकर तैयार नहीं होंगे तब तक रोज ही छुट्टी रखना पड़ेगी?
डिस्मेंटल का भी एक प्रोसेस-
उधर जानकार सूत्रों का यह भी मत है सभी 16 जर्जर शाला भवन हाथों-हाथ गिराएं भी नहीं जा सकते। शासकीय नियमानुसार इंजीनियर की एक टीम पहुंचती है। और वह उन्हें जब तक क्षतिग्रस्त घोषित नहीं करती है, तब तक यह भवन ना तो गिराएं जा सकते और ना ही फिलहाल इनका कोई दूसरा विकल्प सामने नजर आ रहा है। तो क्या सोमवार से ये स्कूल बंद कर दिए जाएंगे? इसका जवाब भी किसी जिम्मेदार के पास नहीं है।
उच्च अधिकारियों की जानकारी में है-
सैलाना के बीआरसी नरेंद्र कुमार पासी का कहना है कि क्षेत्र के अधिकतर शाला भवन 25 से 30 साल पुराने हैं। अभी हाल ही में जर्जर शालाओं की सूची मांगी गई है जो विभाग को दे दी गई है। जर्जर भवन में बच्चों को नही बिठाया जाएगा एवं आस- पास मंदिर या कहीं किसी सुरक्षित स्थान पर स्कूल लगाए जाएंगे। आगे उच्च अधिकारी जैसा निर्देश देंगे वैसा करेंगे।











