जीवन के अंदर धन कम होगा तो चलेगा, परंतु जीवन में आनंद आना चाहिए
14/Jan/2025
ब्यूरो रिपोर्ट mpkikhabar रतलाम
रतलाम (Ratlam,mp)- जैन श्वेतांबर सोधर्म वृहत्त तपागच्छीय राजेंद्र सुरिश्वर त्रिस्तुतिक श्रीसंघ द्वारा नीमवाला उपाश्रय खेरादीवास में आचार्य देवेश श्रीमद्विजय हेमेंद्र सुरिश्वर, जयप्रभ विजय के सुशिष्य एवं आचार्य देवेश श्रीमद्विजय ऋषभचंद्र सुरिश्वर, आचार्य देवेश श्रीमद्विजय हितेश चंद्र सुरिश्वर, मुनिराज दिव्यचंद्रविजय, मुनिराज पुष्पेंद्र विजय, मुनिराज रूपेंद्रविजय, मुनिराज वैराग्ययशविजय आदि ठाणा 5 का मंगल प्रवेश हुआ। मुनिराज वैराग्ययशविजय ने अपने उद्बोधन में कहा कि आपकी भावना यह होनी चाहिए कि साईं इतना दीजिए जा के कुटुंब समाय में भी भूखा ना रहूं। साधु भी भूखा ना जाए। अपने द्वार पर अगर कोई भी साधु संत आए तो वह भूखा नहीं जाना चाहिए। नहीं तो ऊचे मकान फीके पकवान जैसी स्थिति निर्मित हो जाती है। कोई भी संत हो, गुरु हो, वह मन के भाव पढ़ लेते हैं। किसी के हृदय में आपको अभाव नजर आए तो उसके घर नहीं जाना चाहिए। हर जगह भाव देखे जाते है। जीवन के अंदर धन कम होगा तो चलेगा। परंतु जीवन में आनंद आना चाहिए। धन कितना आवश्यक है। जिसके घर में धन अधिक आ जाता है, तो उसकी पाप की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। लक्ष्मी दो प्रकार से आती है। पुण्य से एक पाप कर्म से पुण्य से आती है, तो साधु संतों की सेवा में अच्छी जगह पर धन खर्च होता है। तन को सुख में इंटरेस्ट है। आत्मा को हमेशा आनंद में मजा आता है। इस दुनिया में मूल्य उसका है। जो कीमती है। अपने आप को मूल्यवान बनाना चाहिए। इसमें म.सा. ने छाछ और घी का उदाहरण दिया। छाछ ढुल जाती है, तो हम उसको साफ कर देते हैं। परंतु घी ढुल जाता है तो हम उसको वापस उठने का प्रयत्न करते हैं। क्योंकि वह मूल्यवान है। और अगर आपने अपनी आत्मा का ध्यान नहीं रखा तो जीवन में कुछ भी प्राप्त होने वाला नहीं है, हमारी दौड़ उल्टी है। आत्मा को संभालना चाहिए। हम शरीर को संभालते हैं। यह बात मंगल प्रवचन में कहीं। उक्त जानकारी रत्नराज मित्र मंडल के अध्यक्ष अजय सिसोदिया ने दी।





