महुडीपाड़ा गांव के किसान ने ग्राम स्वराज समूह की बैठकों में जानकारी मिलने के बाद उन्होंने बड़े पैमाने पर हल्दी की खेती की शुरू

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महुडीपाड़ा गांव के किसान ने ग्राम स्वराज समूह की बैठकों में जानकारी मिलने के बाद उन्होंने बड़े पैमाने पर हल्दी की खेती की शुरू

हल्दी से आत्मनिर्भरता की सुनहरी राह

ब्यूरो रिपोर्ट mpkikhabar रतलाम 

रतलाम- (Ratlam) मध्यप्रदेश के रतलाम और झाबुआ की आदिवासी पट्टी में इन दिनों खेतों में लहलहाती हल्दी की हरियाली केवल एक मसाला फसल नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही है। जिन गांवों में कभी परिवारों को अपनी जरूरत की हल्दी भी बाजार से खरीदनी पड़ती थी, वहीं आज वही मिट्टी हजारों परिवारों के लिए आजीविका और आत्मविश्वास का आधार बन रही है। इस परिवर्तन के पीछे वाग्धारा संस्था की पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

वाग्धारा ने अपने कार्यक्षेत्र के लगभग 2000 गांवों में दो लाख से अधिक परिवारों को हल्दी के बीज उपलब्ध कराकर एक व्यापक अभियान शुरू किया। इसके साथ किसानों और महिलाओं को प्रशिक्षण, समूह निर्माण और पोषण वाटिका की अवधारणा से जोड़ा गया। ग्राम स्वराज समूहों और सक्षम समूहों की महिलाओं के माध्यम से यह संदेश घर-घर तक पहुंचाया गया कि हल्दी केवल घरेलू उपयोग की फसल नहीं, बल्कि आय का भी स्थायी स्रोत बन सकती है।

सैलाना क्षेत्र के महुडीपाड़ा गांव के किसान कचरी बाई बताते हैं कि पहले वे थोड़ी-बहुत हल्दी केवल घर के उपयोग के लिए लगाते थे। लेकिन ग्राम स्वराज समूह की बैठकों में जानकारी मिलने के बाद उन्होंने बड़े पैमाने पर इसकी खेती शुरू की। इस वर्ष उन्होंने एक बीघा खेत में हल्दी लगाई है और अच्छी उपज की उम्मीद कर रहे हैं। उनके अनुसार हल्दी की खेती में लागत कम और जोखिम भी अपेक्षाकृत कम होता है।

इस पहल की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी महिलाओं की भागीदारी है। सकरावदा गांव की राजूबाई बताती हैं कि पिछले दो वर्षों से उन्हें बाजार से हल्दी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी। अपने खेत की हल्दी से घरेलू जरूरतें पूरी होने के बाद अब अतिरिक्त उत्पादन बेचकर आय भी प्राप्त हो रही है। इसी गांव की अनीताबाई कहती हैं कि पहले वे प्लास्टिक में पैक हल्दी खरीदती थीं, लेकिन अब अपने खेत की हल्दी उपयोग करने से पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए बेहतर विकल्प मिला है।

कांगसी गांव की लक्ष्मीबाई, राजेश्वरीबाई, गंगाबाई और सुगनाबाई भी अब बाजार पर निर्भर नहीं हैं। घरेलू उपयोग के बाद बची हल्दी को स्थानीय व्यापारियों को बेचकर उन्हें अतिरिक्त आय मिल रही है, जिससे बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरतों के लिए नकदी उपलब्ध हो जाती है।

दरअसल, हल्दी की यह पहल केवल आर्थिक बदलाव तक सीमित नहीं है। इससे महिलाओं की सामाजिक भूमिका भी मजबूत हुई है और वे अब खेती और विपणन से जुड़े निर्णयों में सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। हल्दी की यह कहानी बताती है कि सामुदायिक प्रयास, सही मार्गदर्शन और स्थानीय संसाधनों के उपयोग से साधारण-सी फसल भी ग्रामीण जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। खेतों में उगती हल्दी आज इन गांवों में आत्मनिर्भरता की सुनहरी पहचान बन चुकी है।

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